वृन्दावन कौ जस अमल, जेहि पुराण में नाहिं।
ताकी बानी परौ जिनि, कबहुँ श्रवनन माहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (84)
ताकी बानी परौ जिनि, कबहुँ श्रवनन माहिं॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (84)
वृन्दावन का पावन यश जिस पुराण में नहीं है, उसकी बात कभी मेरे कानों में न पड़े।

