जासौं सपरस चाहिए  - भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उत्तरार्ध] (21)

जासौं सपरस चाहिए - भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उत्तरार्ध] (21)

जासौं सपरस चाहिए, तासों अपरस नित।
जासौं अपरस चाहिए, तासों चिभुकौ चित्त॥

- भगवत रसिक, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उत्तरार्ध] (21)

जिनके संसर्ग में नित्य रहना चाहिए, उन रसिक महापुरुषों से लोग दूर रहते हैं, और जिन आसक्त जीवों से दूर रहना चाहिए, उनसे चुम्बक की तरह मन चिपका रहता है।