"ऐ हरी मो सौ न बिगारन कौ, तो सौ न सँवारन कौ, मोहिं तोहिं परी होड़ ||"
- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (4)
- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (4)
एक हम जीव हैं जिन को हमेशा सभी काम बिगड़ने की आदत पड़ी हुई है और दूसरी तरफ अति अकारण करुणा वरुणालय करुणामय बिहारी जी जो हमारा काम बनाने में ही लगे रहते हैं।हमारा हित करने वाले बिहारी जी से बढ़ कर कोई नही है।हम बिगड़ने वाले हैं और बिगाडने वाले हैं ,जीव और बिहारी जी में इस की होड़ लगी हुई है।

