पट तर बृन्दाविपिन की, कहिं धौं दीजै काहि।
जेहि बन की ध्रुव रेनु में, मरिबौउ मंगल आहि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (71)
जेहि बन की ध्रुव रेनु में, मरिबौउ मंगल आहि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (71)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि वृन्दावन की समता किसी से भी करना सर्वथा असंभव है क्योंकि वृन्दावन की रज में मृत्यु को प्राप्त होना भी मंगलमय है।

