वृन्दावन के बसत ही, अंतर जो करै आनि।
तिहि सम सत्रु न और कोऊ, मन बच कै यह जानि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (50)
तिहि सम सत्रु न और कोऊ, मन बच कै यह जानि॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (50)
दृढ़तापूर्वक यह जान लो और मान लो कि वृन्दावनवास (अर्थात् निरन्तर भजन) में जो भी आकर बाधा डाले, उसके समान कोई शत्रु नहीं है।

