“ नर्क स्वर्ग अपवर्ग आस नहिं त्रास है। जहँ राखौ तहँ रहौं मानि सुख रासि है ||
देउ दया करि दान, न भूलौं केलि कौं। भगवत बलित-तमाल, बिलोकौं बेलि कौं ||”
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (46)
देउ दया करि दान, न भूलौं केलि कौं। भगवत बलित-तमाल, बिलोकौं बेलि कौं ||”
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (46)
न तो मुझे स्वर्ग और मुक्ति की तनिक भी आशा है, न ही नरक का ज़रा सा भी भय है, जहाँ आप रखोगे वहीँ मैं सुख की राशि का अनुभव करता रहूँगा। मुझ पर इतनी कृपा करें की मेरे स्मरण में निरंतर आप दोनों गलबाहीं दिए क्रीड़ा करते रहें।

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