“ मोसो पतित न अनत समाई, याहि तें मैं वृन्दावन की सरन गह्यो है आई | ” - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्ध (17)

“ मोसो पतित न अनत समाई, याहि तें मैं वृन्दावन की सरन गह्यो है आई | ” - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्ध (17)

मोसो पतित न अनत समाई, याहि तें मैं वृन्दावन की सरन गह्यो है आई।”
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्ध (17)

मेरे समान कोई पतित नहीं है, इसी लिए मैंने वृन्दावन की शरण ली है।