सकहि तौ वृन्दाविपिन बसी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (48)

सकहि तौ वृन्दाविपिन बसी - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (48)

सकहि तौ वृन्दाविपिन बसी, छिन-छिन आयु बिहात।
ऐसौ समै न पाइहै, भली बनी है बात॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (48)

प्रत्येक क्षण आयु नष्ट हो रही है, यदि कर सकते हो तो वृन्दावनवास करो। अभी अवसर बना है, फिर ऐसा संयोग नहीं बनेगा।