“ जो रज शिव सनकादिक दुर्लभ, सो रज सीष चढ़ाऊँ | किशोरी तोरे चरनन की रज पाऊँ | ” - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (293)

“ जो रज शिव सनकादिक दुर्लभ, सो रज सीष चढ़ाऊँ | किशोरी तोरे चरनन की रज पाऊँ | ” - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (293)

जो रज शिव सनकादिक दुर्लभ, सो रज सीष चढ़ाऊँ | किशोरी तोरे चरनन की रज पाऊँ | 
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (293)

श्री हरिराम व्यास जी श्री राधा रानी से उनके चरणों की रज पाने की प्रार्थना कर रहे हैं। यह वही वृन्दावन रज है जो सनकादिक एवं शिव जी आदि भी पाने के लिए सदा लालायित रहते हैं, उसी रज को प्राप्त कर प्रेम विभोर होकर अपने मस्तक पर धारण करूँ।