जुगल लाल छवि अति कठिन, सपने हू न दिखाय।
निश्चै मिलै सु तासु जो, श्री वृन्दावन जाय॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (237)
निश्चै मिलै सु तासु जो, श्री वृन्दावन जाय॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (237)
यद्यपि स्वप्न की अवस्था में भी उस अलौकिक युगल-छवि के दर्शन पाना परम दुर्लभ है, तथापि जो भी अनन्य भाव से श्रीवृन्दावन धाम की शरण ग्रहण करेगा, उसे उस दिव्य छवि के साक्षात् दर्शन निश्चित रूप से प्राप्त होंगे।

