“ वृन्दावन विहरत फिरै, जुगल रूप नैननि भरै || ”
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (37)
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (37)
श्री भगवत रसिक जी वृन्दावन रस के उपासक को सलाह देते हुए कहते हैं कि वृन्दावन में युगल उपासना है इसलिए जहाँ जहाँ भी वृन्दावन में विहरण करो, उससे पहले युगल रूप को अपनी आँखों में लाओ अर्थात युगल छवि का रूपध्यान करो।

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