“ लोभिनि वृन्दावन न सुहात, सहज माधुरी कौ रस, कैसे नीरस हृदय समात || ”
- श्री हरिराम व्यास - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (269)
- श्री हरिराम व्यास - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (269)
लोभ से युक्त व्यक्ति को वृन्दावन नहीं सुहाता। यहाँ सहज रूप से ही वृन्दावन रस बरसता है, यह नीरस हृदय में कैसे समायेगा ?

