श्यामा पग दृढ़ गहु सखी, मिलिहैं निश्चै श्याम।
न मानै दृग देख ले, श्यामा पद विच श्याम॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (236.4)
न मानै दृग देख ले, श्यामा पद विच श्याम॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (236.4)
हे सखी! तू श्री श्यामा जू (श्री राधा) के चरणों को दृढ़ता से पकड़ ले, तो तुझे निश्चय ही श्री श्यामसुन्दर मिल जाएँगे। यदि तुम्हें इस सत्य पर लेशमात्र भी संशय हो, तो स्वयं श्रीराधारानी के उन पावन चरणों में जाकर देख लो, जहाँ श्यामसुन्दर सदैव नतमस्तक होकर विराजमान रहते हैं।

