“ वैदग्ध्य सिन्धु अनुराग-रसैक सिंधु, वात्सल्य सिंधु, अतिसान्ध्र कृपैक सिंधु ||
लावण्य सिन्दु अमृतछवि रूप सिंधु, श्री राधिका स्फुरतु मे हृदय केलि सिंधु || ”
- हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि - 17
लावण्य सिन्दु अमृतछवि रूप सिंधु, श्री राधिका स्फुरतु मे हृदय केलि सिंधु || ”
- हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि - 17
कला विलास की सिंधु, अनुराग रस की एक मात्र सिंधु, अतिशय ममत्व एवं वात्सल्य की सिंधु, अत्यंत प्रगाढ़ कृपा की सिंधु , अत्यंत मोहिनी एवं लावण्य सिंधु, अमृत छवि साक्षात् महाभाव स्वरुप सिंधु, अंतरंग केलि सिंधु स्वरूपा श्री राधा मेरे हृदय में प्रकट हों।

