“नवल वृन्दावन नवल बसंत,
नव रस रसिक बिहारिनि दासी के नव आनन्दहि न अंत || ”
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (122)
नव रस रसिक बिहारिनि दासी के नव आनन्दहि न अंत || ”
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (122)
श्री बिहारिन देव जी के शब्दों में नित्य ही नया वृन्दावन है, नयी बसंत है, नित्य नया युगल वृन्दावन रस है , नित्य नया आनंद है और अनंत काल तक इसका अंत नहीं है।

