लोक चतुर्दश ठकुरई - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (47)

लोक चतुर्दश ठकुरई - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (47)

लोक चतुर्दश ठकुरई, सम्पति सकल समेत।
सब तजि बसी वृन्दाविपिन, रसिकनि कौ रस खेत॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (47)

यदि एक ओर चौदह भुवनों का समस्त ऐश्वर्य और असीम सम्पत्ति भी सुलभ हो, तो भी रसिक साधक को उस नश्वर सुख का परित्याग कर देना चाहिए। उसे तो केवल रसिकों के परम पावन रस-क्षेत्र श्रीवृन्दावन धाम का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिए।