“ नमो नमो श्री वृन्दावनचंद,
नित्य अनंत अनादि एक रस, पिय प्यारी विहरत स्वछंद | ”
- श्री भगवद रसिक, भगवद रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (34)
श्री वृन्दावन धाम को हमारा बारम्बार प्रणाम है जहाँ श्री नित्य अनंत युगल रस बरसता है और पिय प्यारी स्वछंद विहार करते हैं।
नित्य अनंत अनादि एक रस, पिय प्यारी विहरत स्वछंद | ”
- श्री भगवद रसिक, भगवद रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (34)
श्री वृन्दावन धाम को हमारा बारम्बार प्रणाम है जहाँ श्री नित्य अनंत युगल रस बरसता है और पिय प्यारी स्वछंद विहार करते हैं।

![नमो नमो श्री वृन्दावनचंद - श्री भगवद रसिक, भगवद रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (34)](https://images.brajrasik.org/5a4f334659e8c72a534d86dd-m.jpeg)