“ यस्याः कदापि वसनाञ्चलखेलनोत्थ, धन्यातिधन्यपवनेन कृतार्थमानी |
योगीन्द्रदुर्गमगतिर्मधुसूदनोऽपि, तस्या नमोऽस्तु वृषभानुभुवो दिशेऽपि || (1) ”
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि - (1)
योगीन्द्रदुर्गमगतिर्मधुसूदनोऽपि, तस्या नमोऽस्तु वृषभानुभुवो दिशेऽपि || (1) ”
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा निधि - (1)
किसी समय जिनके नीलाचल के हिलने से उठे हुए धन्यातिधन्य पवन को स्पर्श करके योगिन्द्रों के लिए अति दुर्गम गति मधुसूदन श्री कृष्ण ने भी अपने आपको कृतार्थ माना, उन श्री वृषभानुनंदिनी श्री राधा की दिशा को नमस्कार हो।

