ऐसे रस में दिन मगन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (33)

ऐसे रस में दिन मगन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (33)

ऐसे रस में दिन मगन, नहीं जानत निसि भोर।
वृन्दावन में प्रेम की, नदी बहै चहुँ ओर॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (33)

अद्भुत श्रीवृन्दावन-रस में निरंतर निमग्न रहने के कारण, यहाँ के रसिकों को अपने देह-गेह की कोई सुध-बुध नहीं रहती और वे काल (समय) की सीमाओं से सर्वथा परे हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो श्रीवृन्दावन के कण-कण में प्रेम-रस की एक अविरल धारा प्रवाहित हो रही है, जिसमें रसिक जन सदैव सराबोर रहते हैं।