इष्ट धर्म, मन मत मिलै, रहनी गहनि स्वभाव।
भगवत ऐसे भक्त सौं, मिलत बढे चित चाव॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (18)
भगवत ऐसे भक्त सौं, मिलत बढे चित चाव॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (18)
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं—जिससे हमारे इष्टधर्म, मत-विचार, रहनी और स्वभाव मिलते हैं, उससे मिलने पर हमारा हृदय आनन्द से फूल उठता है।

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