जिनकौ वृन्दाविपिन है, कृपा तिनहिं की होइ।
वृंदावन में तबहि तौ, रहन पाई है सोइ॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (102)
वृंदावन में तबहि तौ, रहन पाई है सोइ॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (102)
श्रीवृन्दावन धाम जिनका निज स्वरूप और क्रीड़ा-स्थल है (अर्थात् श्रीराधारानी का), केवल उन्हीं की अहैतुकी कृपा से ही कोई जीव यहाँ वास कर सकता है; अन्यथा यहाँ का वास सर्वथा अप्राप्य है।

