“ दूराद्पास्य स्वजनान् सुखमर्थकोटिं, सर्वेषु साधनवरेषु चिरं निराशः |
वर्षन्तमेव सहजाद्भुत सौख्य धारां, श्रीराधिका चरणरेणु महं स्मरामि ” ||
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, राधा सुधा निधि - 32
वर्षन्तमेव सहजाद्भुत सौख्य धारां, श्रीराधिका चरणरेणु महं स्मरामि ” ||
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, राधा सुधा निधि - 32
मैंने अपने स्वजन सम्बन्धी वर्ग और कोटि कोटि सम्पतियों के सुख को दूर से ही त्याग दिया है, इतना ही नहीं परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों में भी मेरी चिरकाल तक निराशा हो चुकी है। अब तो मैं सहज अद्बुध रस की धारा करने वाली श्री राधिका चरण रेणु (रज) की महिमा का ध्यान कर उसका स्मरण करूँगा ।

