दरसें परसें अंग अंग लसैं विलसैं सुख सिंधु न प्रेम अघैहूँ - श्री बिहारिन देव जी

दरसें परसें अंग अंग लसैं विलसैं सुख सिंधु न प्रेम अघैहूँ - श्री बिहारिन देव जी

“ दरसें परसें अंग अंग लसैं विलसैं सुख सिंधु न प्रेम अघैहूँ |
नित्य विहार आधार हमारे, श्री बिहारी बिहारिनि की बलि जैहौं || ”

- श्री बिहारिन देव जी

जहां जहाँ भी कोई देखता है, श्री प्रेम रस सिंधु समुद्र श्री राधाकृष्ण के प्रत्येक अंग से रस ही रस बरसता है। श्री बिहारिन देव कहते हैं कि हम रसिकों के जीवन का आधार एक मात्र नित्य विहार है, हम बार बार श्री बिहारी और बिहारिनि पर बलिहार जाते हैं |