नाते जेते जगत के, ते सब मिथ्या मान।
सत्य नित्य आनंद मय, वृन्दावन पहिचान॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (66)
सत्य नित्य आनंद मय, वृन्दावन पहिचान॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (66)
जगत के जितने भी सम्बन्धी हैं, वे सब मिथ्या हैं एवं एक अवधि तक ही सीमित हैं। वृन्दावन धाम जो श्रीकृष्ण की भाँति ही सच्चिदानन्दमय है, उसे पहचानो।

