खावे नहीं पछिताइ सो, खावे सो पछिताइ।
यह जग लाडू भूत कौ, दुहूँ भाँति दुखदाई॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (11)
यह संसार भूत के लड्डू के समान है—जो इसे भोगता है, वह पछताता ही है; और जो नहीं भोगता, वह भी इसकी लालसा में पछताता है। दोनों ही स्थितियों में यह दुःखदायक है क्योंकि यह अनित्य, भ्रमपूर्ण और असली सुख से रहित है।
यह जग लाडू भूत कौ, दुहूँ भाँति दुखदाई॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (11)
यह संसार भूत के लड्डू के समान है—जो इसे भोगता है, वह पछताता ही है; और जो नहीं भोगता, वह भी इसकी लालसा में पछताता है। दोनों ही स्थितियों में यह दुःखदायक है क्योंकि यह अनित्य, भ्रमपूर्ण और असली सुख से रहित है।

