जप, तप, तीरथ, दान, ब्रत, जोग, जज्ञ, आचार।
भगवत भक्ति अनन्य बिन जीब भ्रमत संसार॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (17)
जो मनुष्य श्रीहरि की अनन्य भक्ति का आश्रय ग्रहण नहीं करता और केवल विविध जप, तप, तीर्थाटन, दान, व्रत, योग, यज्ञ एवं कर्मकांडों के जाल में उलझा रहता है, वह वास्तव में संसार के आवागमन के चक्र में ही भ्रमित हो रहा है।
भगवत भक्ति अनन्य बिन जीब भ्रमत संसार॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (17)
जो मनुष्य श्रीहरि की अनन्य भक्ति का आश्रय ग्रहण नहीं करता और केवल विविध जप, तप, तीर्थाटन, दान, व्रत, योग, यज्ञ एवं कर्मकांडों के जाल में उलझा रहता है, वह वास्तव में संसार के आवागमन के चक्र में ही भ्रमित हो रहा है।

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