श्री गोविंद देव, वृंदावन

श्री गोविंद देव, वृंदावन

यह एक प्रसिद्ध मंदिर है जिसे श्री रूप गोस्वामी जी ने प्रकाशित किया है।  श्री गोविंद देव जी श्री रूप गोस्वामी जी को जमीन के नीचे मिले थे जहां इस समय यह मंदिर स्थापित है। श्री गोविंद देव जी की स्थापना श्री वज्रनाभ जी ने 5000 साल पहले (एक जगह जो गोविंद पीठ के नाम से विख्यात है) की थी।

श्री रूप गोस्वामी सेवा कुंज में श्री राधा दामोदर मंदिर के पास एक कुटिया बनाकर भजन करते थे। श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा अनुसार वह श्री गोविंदा जी को प्रकाशित कर उनकी स्थापना करना चाहते थे। वह प्रतिदिन परिक्रमा लगाते थे।  एक दिन जब वह परिक्रमा लगा रहे थे तब वह श्री गोविंद देव जी के ध्यान में अत्यंत व्याकुल हो उठे। तब वह यमुना जी के किनारे एक वृक्ष के नीचे बैठ कर रोने लगे और व्याकुल होकर श्री गोविंद देव जी के दर्शन के लिए रुदन करने लगे । तभी एक ब्रजवासी लड़का जो उनके साथ परिक्रमा कर रहा था, वह उनके पास आया और उनसे पूछा कि आप रो क्यों रहे हैं। पहले तो रूप गोस्वामी जी ने कुछ नहीं कहा परंतु बाद में उन्होंने अपने हृदय में जो चल रहा था वह सब कुछ ब्रज वासी लड़के को बता दिया। उसी क्षण बृजवासी लड़का उन्हें गोमा टीले पर ले गया और वहां उन्होंने बोला कि यहां प्रतिदिन एक गाय दूध देने आती है, लगता है आपकी आकांक्षा और इच्छा यहां पूरी हो जाएगी। ऐसा बोलकर वह ब्रजवासी लड़का अंतर्ध्यान हो गया। उस ब्रज वासी लड़के की मधुर वाणी और रूप सौंदर्य देखकर श्री रूप गोस्वामी भाव में बेहोश हो गए। उनके होश आते ही उन्होंने आस पास के ब्रज वासियों को अपने पास बुलाया और जिस जगह पर उस बृजवासी लड़के ने उन्हें बताया था वहां उन्होंने खुदाई शुरू की। थोड़ी ही खुदाई करने पर उन्हें श्री गोविंद देव जी मिले जो अनंत कामदेव के सौंदर्य को भी हेय करने वाले थे। उन्होंने श्री गोविंद देव जी को नहलाया और समस्त बृजवासी एकत्रित हो गए। 

श्री रूप गोस्वामी जी के आने से पहले श्री राधिका जी को जगन्नाथ पुरी धाम में चक्रबति जगह पर लक्ष्मी देवी के रूप में पूजा जाता था। श्री राधा जी ने महाराज प्रताप रुद्र के पिता को सपने में आकर आदेश दिया कि मैं लक्ष्मी नहीं राधा हूं। मैं श्री कृष्ण की प्रेमिका हूं। मैं श्री गोविंद देव जी के प्राकट्य की परीक्षा कर रही हूं। जब श्री गोविंद देव जी वृंदावन में प्रकट हो जाएं तब मुझे वृंदावन भेज देना।

उसके पश्चात जैसे ही पता लगा कि श्री गोविंद देव जी का प्राकट्य हो चुका है तो श्री जान्हवा ठकुरानी जी के संग उन्हें वृंदावन भेज दिया। उसके पश्चात मंदिर के सब गोस्वामी जी ने श्री राधा ठकुरानी को श्री गोविंद देव जी के बाईं ओर स्थापित कर दिया। तो इस तरह श्री राधा गोविंद देव जी का प्राकट्य हुआ।