गीत गोविन्द में, कवि जयदेव जी बताते है कि श्री कृष्ण वन के फूलों से इस प्रकार सजे हुए कि है वे बहुत ही सुंदर लग रहे है। श्री कृष्ण श्री राधा रानी के आने की प्रतीक्षा धीरा समीर में कर रहे थे जहाँ यमुना नदी के तट के पास धीमी हवा चलती है।
धीर का मतलब है कोमल और समीर का अर्थ हवा है। एक बार श्री राधा रानी श्री कृष्ण के साथ धीर-समीर कुंज में बैठी थी और श्री कृष्ण जी अपनी बांसुरी बजा रहे थे। श्री कृष्ण की बांसुरी इतनी मधुर थी कि उन्होंने वृंदावन की हवा के मन को मोहित कर डाला। उस दिन हवा बहुत तेज गति से चल रही थी। लेकिन जब हवा इस जगह से गुजर रही थी तो, श्री कृष्ण की बांसुरी की आवाज सुनकर, हवा बहुत धीरे-धीरे धीमी गति से बहने लगी । हवा भी श्री कृष्ण की बांसुरी की सुंदर आवाज से दूर नहीं होना चाहती थी। इसी कारण इस जगह को धीर समीर के नाम से जाना जाता है।

