फूलि-फूलि रहे सब फूल फुलवारी में के - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (20)

फूलि-फूलि रहे सब फूल फुलवारी में के - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (20)

(कवित्त)
फूलि-फूलि रहे सब फूल फुलवारी में के,
रीझि रीझि छबि आई पाइनि में परी है। [1]
लाडिली नवेली अलबेली सुख सहज ही,
निकसि निकुंज तें अनूप भाँति खरी हैं॥ [2]
नख-सिख भूषन लावण्य ही के जगमगै,
दीठि सौ छुवत सुकुमारताहू डरी है। [3]
‘हित ध्रुव’ मुसिकनि हेरत बिकाइ रहे,
दामिनी की दुति अरु हीरनि की हरी है॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (20)

पुष्प-वाटिका के सभी पुष्प प्रफुल्लित हो रहे हैं, और श्री राधा के अद्भुत सौंदर्य पर मुग्ध होकर मूर्तिमान छवि भी उनके चरणों में विलीन होने लगी है। [1]

नवल लाडिली सुकुमारी सहज प्रसन्न भाव से निकुंज से निकलकर वहाँ आकर खड़ी हुई हैं। [2]

प्रियाजी का नख-शिख लावण्य उनके आभूषणों की तरह जगमगा रहा है। उनके अंगों का अपनी दृष्टि से स्पर्श करने में स्वयं सुकुमारता भी संकुचित हो रही है। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि लाडिली की मृदु मुस्कान दामिनी की द्युति और हीरक मणियों की आभा को तिरस्कृत करने वाली है, जिसे देखकर प्रियतम बिना मोल के उनके दास हो गए हैं। [4]