(राग सारंग)
अब न और कछू करने, रहनै है वृन्दावन ।
हौनौ होइ सो होइ किनि, दिन-दिन आयु घटति झूठे तन ।।
मिलिहैं हित ललितादिक दासी, रास में गावत सुनि मन ।
जमुना-पुलिन-कुञ्ज, बन-बीथिनि, बिहरत गौर-स्याम-घन ।।
कहा सुत-सम्पति-गृह-दारा, कतहु हरि माया के फंदन ।
‘व्यास’ आस छाँड़हु सब ही की, कृपा करी राधा-नंदनदन ।।
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्ध (106)
अरे मन, अब और कुछ नहीं करना केवल वृन्दावन धाम में निवास करके दिन रात युगल सरकार की भक्ति करनी है क्यूंकि इस झूठे तन की आयु दिन पर दिन कम हो रही है | अरे मन, ऐसा मान की तुझे प्राण प्यारी सखियाँ हित सखी और ललिता सखी, रास में मिलेंगी और वन विहार करते हुए विभिन्न वृन्दावन की कुंजों में, यमुना के तट पर गौर श्यामल युगल सरकार की जोरि दिखेगी | अरे मन, यह सुत, सम्पति, घर, दारा इत्यादि कुछ काम नहीं आएंगे, यह माया का फंदा गले में डाल कर तुम्हे चौरासी लाख के चक्कर में ही घुमाएंगे | अरे मन, अब तू समस्त लोगों एवं पदार्थों एवं मुक्ति आदि सुख की भी आस छोड़कर एक मात्र प्रिय प्रियतम की ही शरण ग्रहण कर क्यूंकि वो ही केवल तुझपर कृपा करेंगे |
अब न और कछू करने, रहनै है वृन्दावन ।
हौनौ होइ सो होइ किनि, दिन-दिन आयु घटति झूठे तन ।।
मिलिहैं हित ललितादिक दासी, रास में गावत सुनि मन ।
जमुना-पुलिन-कुञ्ज, बन-बीथिनि, बिहरत गौर-स्याम-घन ।।
कहा सुत-सम्पति-गृह-दारा, कतहु हरि माया के फंदन ।
‘व्यास’ आस छाँड़हु सब ही की, कृपा करी राधा-नंदनदन ।।
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्ध (106)
अरे मन, अब और कुछ नहीं करना केवल वृन्दावन धाम में निवास करके दिन रात युगल सरकार की भक्ति करनी है क्यूंकि इस झूठे तन की आयु दिन पर दिन कम हो रही है | अरे मन, ऐसा मान की तुझे प्राण प्यारी सखियाँ हित सखी और ललिता सखी, रास में मिलेंगी और वन विहार करते हुए विभिन्न वृन्दावन की कुंजों में, यमुना के तट पर गौर श्यामल युगल सरकार की जोरि दिखेगी | अरे मन, यह सुत, सम्पति, घर, दारा इत्यादि कुछ काम नहीं आएंगे, यह माया का फंदा गले में डाल कर तुम्हे चौरासी लाख के चक्कर में ही घुमाएंगे | अरे मन, अब तू समस्त लोगों एवं पदार्थों एवं मुक्ति आदि सुख की भी आस छोड़कर एक मात्र प्रिय प्रियतम की ही शरण ग्रहण कर क्यूंकि वो ही केवल तुझपर कृपा करेंगे |

