"रसिक अनन्य हमारी जाति " - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (121) हमारी जाति यही है कि हम रसिक अनन्य हैं अर्थात हम श्री किशोरी जी के अनन्य भक्त हैं और वृन्दावन ही हमारा जीवन है |