लखी जिन लाल की मुसक्यान  |  तिनहिं बिसरी बेद-बिधि - श्री भागवत रसिक, भागवत रसीक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (40)

लखी जिन लाल की मुसक्यान | तिनहिं बिसरी बेद-बिधि - श्री भागवत रसिक, भागवत रसीक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (40)

लखी जिन लाल की मुसक्यान  |
तिनहिं बिसरी बेद-बिधि, जप,जोग, संजम, ध्यान  | |
नैम, ब्रत, आचार, पूजा, पाठ, गीता-ज्ञान |
रसिक भगवत दृग दई असि, ऐंचि कै मुख म्यान  | |

- श्री भागवत रसिक, भागवत रसीक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (40)

भावार्थ - जिस जिस ने श्रीलालजी की मुस्कान देख ली है, उस उसको वेद-विधि, जप, योग, संयम, ध्यान, नियम, ब्रत, आचार, पूजा पाठ और गीता का ज्ञान- सब कुछ भूल गया है। भगवत रसिक जी कहते हैं कि रसिक लालजी ने यही मुस्कान रूपी तलवार मुख रूपी म्यान से निकालकर हमारे नेत्रों में (ऐसी) मार दी है कि अब ये इस मुस्कान को देखते रहने के अलावा और किसी काम के नहीं रह गये हैं।