लड़ैती तेरे चरण महा सुखदाई|
जिनहिं निरखि लाल भये प्रीतम करत केलि मन भाई ||
कबहुँ सपरस करि आनंद में राखत कंठ लगाईं |
तेइ चरण हमारे मस्तक अब डर करै बलाई ||
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (155)
श्री कुञ्ज विहारिणी श्री राधा, आपके चरण परम प्रेम सुख को देने वाले हैं, इन्ही चरणों को देखकर, सेवन करके श्री लाल जू केलि कला में निपुण हुए हैं। कभी तो वे अत्यंत दीन हीन बनकर इन चरणों का स्पर्श करते हैं, और कभी अत्यंत आनंद में वह इनको अपने कंठ में लगाकर रखते हैं। इन्ही चरणों के बल से ही वह नित्यविहार केलि करते हैं। श्री ललित किशोरीजी कहते हैं की हमारे तो भाग्य ही खुल गए, जो हमको इन चरणों का आश्रय मिल गया है, अब किस बात का भय, चिंता, विपत्ति। अब वह इन श्री राधा के चरणों के बल पर सदा निर्भय रहते हैं।
जिनहिं निरखि लाल भये प्रीतम करत केलि मन भाई ||
कबहुँ सपरस करि आनंद में राखत कंठ लगाईं |
तेइ चरण हमारे मस्तक अब डर करै बलाई ||
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (155)
श्री कुञ्ज विहारिणी श्री राधा, आपके चरण परम प्रेम सुख को देने वाले हैं, इन्ही चरणों को देखकर, सेवन करके श्री लाल जू केलि कला में निपुण हुए हैं। कभी तो वे अत्यंत दीन हीन बनकर इन चरणों का स्पर्श करते हैं, और कभी अत्यंत आनंद में वह इनको अपने कंठ में लगाकर रखते हैं। इन्ही चरणों के बल से ही वह नित्यविहार केलि करते हैं। श्री ललित किशोरीजी कहते हैं की हमारे तो भाग्य ही खुल गए, जो हमको इन चरणों का आश्रय मिल गया है, अब किस बात का भय, चिंता, विपत्ति। अब वह इन श्री राधा के चरणों के बल पर सदा निर्भय रहते हैं।

