देखौ माई सुंदरता की सीवाँ  - हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (52)

देखौ माई सुंदरता की सीवाँ - हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (52)

(राग मल्हार) [वर्षा समय]
देखौ माई सुंदरता की सीवाँ।
व्रज नव तरुनि कदंब नागरी, निरखि करतिं अधग्रीवाँ।।
जो कोउ कोटि कलप लगि जीवे रसना कोटिक पावै।
तऊ रुचिर वदनारबिंद की सोभा कहत न आवै।।
देव लोक भूलोक रसातल सुनि कवि कुल मति डरिये।
सहज माधुरी अंग अंग की कहि कासौं पटतरिये।।
(जै श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुन वय बल स्याम उजागर।
जाकी भ्रू विलास बस पसुरिव दिन विथकत रस सागर

- हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (52)

भावार्थ- श्रीहित सखी (श्री हित हरिवंश महाप्रभु) कहती हैं- हे सखियों ! सुन्दरता की सीमा (श्रीराधा) को तो देखो !जिस नागरी को देख कर समस्त व्रज की नव युवती गण (उसकी सौंदर्य राशि के सामने लज्जावश अपना) सिर झुका लेती हैं अर्थात् उनके रूप के सामने अपने रूप की लघुता स्वीकार करके सिर नीचा कर लेती हैं लजाकर । उन अपार श्रीप्रिया रूप की शोभा का वर्णन करने के लिये यदि कोई कोटि कोटि कल्पों तक जीवित रहकर कोटि कोटि जिह्वायें प्राप्त कर भी ले तो भी उस रुचि पूर्ण मुख कमल की शोभा का वर्णन वह नहीं कर सकता। (उससे वह शोभा कहते ही न आवेगी) देवलोक, भूलोक एवं रसातल के समस्त कवि कुल (समुदाय) की बुद्धि (उस रूप की महिमा का वर्णन) सुन सुन कर डरती रहती है कि हम उस अंग प्रत्यंग के सहज माधुर्य की उपमा दें तो दें किससे ? (अथवा श्रीहित जी कहते हैं कि जिसके वर्णन करने में समस्त कवि कुल की मति चौंधया रही है फिर मैं ही उस रूप की उपमा कैसे और किससे दूँ ?") श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं, मैं इतना ही कहूं -"श्रीश्याम सुन्दर तो प्रताप, रूप, गुण, आयु (वय) एवं बल सभी बातों में उजागर हैं-प्रगट हैं फिर भी वे रस समुद्र श्याम जिसकी भृकुटियों के इशारे के वशवर्त्ती पशु की भाँति निरन्तर लाचार से रहे आते हैं, (उस रूप की सीमा-श्रीराधा-को देखो, समझो)" ।