वृंदावन के गुनन सुनि, हित सों रज में लोट।
जेहि सुख कौ पूजत नहीं, मुक्ति आदि सत कोट॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (72)
जेहि सुख कौ पूजत नहीं, मुक्ति आदि सत कोट॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (72)
वृन्दावन के गुण श्रवण करो, प्रेम-भावपूर्वक यहाँ की रज में लोटो। इस सुख की बराबरी अनन्त मुक्ति-सुख भी नहीं कर सकते।

