जीव दशा कछु इक सुनी भाई।
हरि जस अमृत तजि विष खाई॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (1)
प्रायः जीव की दशा ऐसी है कि हरि जो अमृत के समान हैं (आनन्दस्वरूप), उनको त्यागकर वह संसारी जीव/वस्तु जो विष के समान हैं (अर्थात् हर क्षण स्वार्थ-सिद्धि ही करते हैं) उनमें ही नित्य मन लगाए हुए है और दुःख भोग रहा है।
हरि जस अमृत तजि विष खाई॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (1)
प्रायः जीव की दशा ऐसी है कि हरि जो अमृत के समान हैं (आनन्दस्वरूप), उनको त्यागकर वह संसारी जीव/वस्तु जो विष के समान हैं (अर्थात् हर क्षण स्वार्थ-सिद्धि ही करते हैं) उनमें ही नित्य मन लगाए हुए है और दुःख भोग रहा है।

