"सुनहु रसिक श्री वृन्दावन को जस,
इहि वन नित्य नवीन युगल वर,
द्रुम दल दिव्य श्रवत सलिता लस"
- श्री विट्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जी की वाणी (13)
रसिक भक्तों श्री वृन्दावन धाम की महिमा एवं यश सुनें, इस वन में नित्य ही श्री युगल वर श्री राधा कृष्ण नित्य ही नवीन रहते हैं (अर्थात नित्य नवनमान रसयुक्त ) | यहाँ के वृक्ष, लताएं सब दिव्य हैं, यमुना रस रानी सब दिव्य हैं एवं हर क्षण रस में निमग्न हैं |
इहि वन नित्य नवीन युगल वर,
द्रुम दल दिव्य श्रवत सलिता लस"
- श्री विट्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जी की वाणी (13)
रसिक भक्तों श्री वृन्दावन धाम की महिमा एवं यश सुनें, इस वन में नित्य ही श्री युगल वर श्री राधा कृष्ण नित्य ही नवीन रहते हैं (अर्थात नित्य नवनमान रसयुक्त ) | यहाँ के वृक्ष, लताएं सब दिव्य हैं, यमुना रस रानी सब दिव्य हैं एवं हर क्षण रस में निमग्न हैं |

