संग सोई जाके मिले भूलै गृह व्यौहार - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (32)

संग सोई जाके मिले भूलै गृह व्यौहार - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (32)

संग सोई जाके मिले, भूलै गृह व्यौहार।
तिहिं छिन आवै हिये में, अद्भुत युगल विहार॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, मन शिक्षा (32)

श्रीध्रुवदासजी का कथन है कि रसोपासना के मार्ग में साधक को केवल उन्हीं का संग करना चाहिए, जिनके सान्निध्य में आते ही समस्त सांसारिक व्यवहार विस्मृत हो जाएँ। वह संग ऐसा दिव्य होना चाहिए जिससे उपासक के अंतःकरण में श्रीप्रिया-प्रियतम के अद्भुत युगल-विहार की सतत स्फूर्ति होने लगे; वास्तव में वही वास्तविक सत्संग है।