बानी बीजक बस्तु कौ बीजक बस्तु न होइ - श्री भगवत रसिक, भगवतरसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.7)

बानी बीजक बस्तु कौ बीजक बस्तु न होइ - श्री भगवत रसिक, भगवतरसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.7)

बानी बीजक बस्तु कौ बीजक बस्तु न होइ |
बीजक बस्तु बतावही, लहै जासु की होइ ||
लहै जासु की होइ, और की, और न पावै |
गावै सब संसार, हाथ बिरतले के आवै ||
ऐसौहिं नित्यबिहार स्याम स्यामाँ सुखदानी |
भगवत रसिक अनन्य गूढ गुन गावत बानी ||

- श्री भगवत रसिक, भगवतरसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.7)

रसिकों की वाणियों (नित्यबिहार रूपी सम्पत्ति) वस्तु उसे ही मिलती है, जो उसका अधिकारी है। एक की वस्तु को दूसरा नहीं पा सकता। वाणी सरूपी बीजक हैं और नित्य विहार सम्पति है। बीजक, वस्तु की सूचना भर देते हें। भगवतरसिक जी कहते हैं कि आचार्य और रसिकों की रचनाओं को तो सारा संसार ही पढता है, किंतु उनमें निर्देशित वस्तु नित्यबिहार किसी विरले अधिकारी के ही हाथ लगती है।वस्तुतः यह नित्य विहार की बात विषयी हृदय को जचेगी ही नहीं। भगवतरसिक जी जैसे अनुभवी रसिक संत जिसके गूढ गुणों का गायन करते हैं, वह श्यामा श्याम को परमानंद प्रदान करने वाला नित्यबिहार वस्तुतः ऐसा ही अगम्य है।