तन अवही कौ कामै आयो - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) व्यास वाणी, पूर्वार्ध (125)

तन अवही कौ कामै आयो - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) व्यास वाणी, पूर्वार्ध (125)

(राग सारंग व भूपाली)
तन अवही कौ कामै आयो |
साधु चरन कौ संग कियो, जिन हरिजू को नाम लिवायो||
धन्य वदन मेरौ जिनि, रसिकन को जूँठौ खायौ|
रसना मेरी धन्य अनन्यनि को चरणोदक प्यायौ||
धन्य सीस मेरौ श्री राधारमन रेनु रस लायौ |
धन्य नैनं मेरे जिनि वंदावन कौ सुख दिखरायौ||
धन्य चरन मेरे वृन्दावन गहि अनत न धायौ |
धन्य हाथ मेरे जिन कुंजन में हरिमंदिर छायौ||
धन्य व्यास के श्रीगुरू जिन, सर्वोपरि रंग वतायौ|

-श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्ध (125)

श्री हरिराम व्यास (श्री विशाखा सखी अवतार ) के शब्दों में, मेरा तन जो आज काम आया है धन्य है। धन्य है जो इसने साधु चरणों का संग किया जिसके परिणाम स्वरुप श्री हरि का नाम बिना प्रयास के ले सका। मेरा बदन धन्य है जिन्होंने रसिकों का झूठा खाया। धन्य है मेरी रसना जो अनन्य रसिक भक्तों का पद जल पायी है। धन्य है मेरा शीश जिसने राधा रमण की चरण रेणु (वृन्दावन रज) का रस पाया। धन्य है मेरे नैन जिन्होंने वृंदावन के दर्शन किए। धन्य है मेरे चरण जो वृंदावन को छोड़कर कहीं नहीं जाते। धन्य है मेरे हाथ जो कुंज में श्रीहरि के मंदिर में निरंतर सेवा करते हैं। धन्य हैं मेरे गुरु जिनकी वजह से वृंदावन रस रंग चढ़ सका।