लात हनी भृगु हृदय में - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (19)

लात हनी भृगु हृदय में - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (19)

लात हनी भृगु हृदय में, हरि कीन्हीं सनमान।
अम्बरीष अपराध सुनि, भगवत मूंदे कान॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (19)

जब भृगुजी ने भगवान् के वक्षस्थल पर लात मारी तो भगवान् ने अपने ऊपर किये हुए पादाघात के अपराध पर रुष्ट न होकर भृगुजी का सम्मान किया। किन्तु जब भगवान् ने यह सुना कि दुर्वासाजी ने मेरे भक्त अम्बरीष का अपराध किया है, तो उन्होंने अपने कान बंद कर लिये और चक्र चला दिया। भगवान् अपने भक्त के प्रति अपराध किये जाने की बात भी सुन नहीं सकते, फिर यह तो वे कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकते कि उनके भक्त पर कोई अपराध करे।