शिव-विधि-उद्धव सबनि कैं, यह आसा रहै चित्त।
गुल्म लता ह्वै सिर धरैं, वृंदावन रज नित्त॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (44)
गुल्म लता ह्वै सिर धरैं, वृंदावन रज नित्त॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (44)
शिव, ब्रह्मा, उद्धव आदि के मन में यही आशा रहती है कि हम श्री वृन्दावन की कोई लता या वृक्ष होकर श्री वृन्दावन रज को नित्य शिरोधार्य कर सकें।

