छण भंगुर तन जात है - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (63)

छण भंगुर तन जात है - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (63)

छण भंगुर तन जात है, छाँड़हि विषै अलोल।
कौड़ी बदले लेहि तू, अद्भुत रतन अमोल॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (63)

क्षणभंगुर यह देह, काल के गाल में पड़ी है। अतः जीव को विषयों का लोभ त्यागना चाहिए, और विषय‑सुखरूपी कौड़ी को छोड़कर श्री वृन्दावन‑रसरूपी अनमोल रत्न प्राप्त करना चाहिए।