राधे राधे जो जन कहै। महा प्रेम रस सोई लह||
प्रिया लाल तिनके सुख ढरें। रीझि रीझि अंक में भरें||
छिन छिन अति आनंद बढ़ाये। श्री कुंज बिहारिनि निरखि सिहावें||
यही बात सब सुख को सार। रसिकनी जीवन प्रान अधार||
- श्री ललित किशोरी - अभिलाष माधुरी
ललित किशोरी जी के शब्दों में जो जन श्री "राधे राधे" कहता है (यह मानकर की किशोरीजी उनके नाम में बैठी हैं ) वह महा प्रेम रस प्राप्त करता है। प्रिया लाल उनसे रीझ कर उनको परम सुख प्रदान करते हैं और अपनी निज सेवा देते हैं। उनका हर क्षण आनंद बढ़ता ही जाता है, इस राधा नाम के प्रभाव से और कुंज बिहारिनि श्री राधा के रूप की छवि उनके हृदय में छाई रहती है। श्री ललित किशोरी जी के शब्दों में यह राधा नाम सब रस एवम सुख का मानो सार ही है और रसिकों के प्राण जीवन का आधार है।
प्रिया लाल तिनके सुख ढरें। रीझि रीझि अंक में भरें||
छिन छिन अति आनंद बढ़ाये। श्री कुंज बिहारिनि निरखि सिहावें||
यही बात सब सुख को सार। रसिकनी जीवन प्रान अधार||
- श्री ललित किशोरी - अभिलाष माधुरी
ललित किशोरी जी के शब्दों में जो जन श्री "राधे राधे" कहता है (यह मानकर की किशोरीजी उनके नाम में बैठी हैं ) वह महा प्रेम रस प्राप्त करता है। प्रिया लाल उनसे रीझ कर उनको परम सुख प्रदान करते हैं और अपनी निज सेवा देते हैं। उनका हर क्षण आनंद बढ़ता ही जाता है, इस राधा नाम के प्रभाव से और कुंज बिहारिनि श्री राधा के रूप की छवि उनके हृदय में छाई रहती है। श्री ललित किशोरी जी के शब्दों में यह राधा नाम सब रस एवम सुख का मानो सार ही है और रसिकों के प्राण जीवन का आधार है।

