कहँ लौं बैकुंठ लोकहूँ, रूचि नहीं तुक सपनेहुँ मोरी।
इक भावत चंचल नंदनंदन, एक वृषभानुलली भोरी॥
- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज
इक भावत चंचल नंदनंदन, एक वृषभानुलली भोरी॥
- जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज
मेरी रुचि अब वैकुण्ठ लोक में भी तनिक मात्र नहीं रही, यहाँ तक कि स्वप्न में भी मैं वहाँ जाने की इच्छा नहीं करता। मुझे तो बस एक ओर वे चंचल नन्दनन्दन (श्री कृष्ण) भाते हैं, और दूसरी ओर वे परम भोली श्री वृषभानुनन्दिनी श्री राधा जी प्रिय लगती हैं।

