दिये लिये मन रहें सहेली दंपति मिले खिलौना - चाचा वृंदावन दास

दिये लिये मन रहें सहेली दंपति मिले खिलौना - चाचा वृंदावन दास

दिये लिये मन रहें सहेली, दंपति मिले खिलौना।
कानन छवि सर क्रीडत साँवल, गौर हंस मनु छीना॥

- चाचा वृंदावन दास

परम रसिक श्रीवृन्दावनदासजी (चाचाजी) के अनुसार, श्रीयुगल-किशोर निकुंज में जो भी दिव्य क्रीड़ाएँ और विलास करते हैं, उनका प्रयोजन स्वयं की रुचि या प्रीति की तुष्टि नहीं है, अपितु वे अपनी प्राणप्रिय सखियों के आनंदवर्धन हेतु ही लीला करते हैं। वे दोनों तो प्रेम के वशीभूत होकर अपनी सखियों के कर-कमलों के खिलौने (यंत्रपुतली) के समान बन गए हैं।