श्री नरहरि दास निरखि तृण तोरति - श्री नरहरि दास, श्री नरहरी देव जी की वाणी (8)

श्री नरहरि दास निरखि तृण तोरति - श्री नरहरि दास, श्री नरहरी देव जी की वाणी (8)

श्री नरहरि दास निरखि तृण तोरति, यह छवि बरनी न जाए।
नैंननि भरी शोभा रस पीवत, पीवत मन न अघाइ॥

- श्री नरहरि दास, श्री नरहरी देव जी की वाणी (8)

श्रीनरहरिदासजी श्रीयुगल सरकार की उस अनुपम और मधुर छवि का दर्शन कर स्वयं को उन पर न्योछावर (बलिहारी) करते हुए कहते हैं कि यदि मेरे ये नयन निरंतर और अखंड रूप से उस दिव्य श्रृंगार-शोभा के रसमय माधुर्य का पान करते रहें, तब भी यह प्यासा मन कभी तृप्त (अघायेगा) नहीं होगा।