वृंदावन तें अनत ही जेतिक द्यौस बिहात - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (58)

वृंदावन तें अनत ही जेतिक द्यौस बिहात - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (58)

वृंदावन तें अनत ही, जेतिक द्यौस बिहात।
ते दिन लेखे जिनि गनौ, वृथा अकारथ जात॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (58)

वृंदावन से अन्यत्र जितने भी दिन बीते उन्हें गिनना ही नहीं चाहिए क्योंकि वह तो किसी काम के ही नहीं हैं अर्थात व्यर्थ हैं।