नयौ नेह नव रंग नयौ रस - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (५४)

नयौ नेह नव रंग नयौ रस - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (५४)

(राग मल्हार) [वर्षा समय]
नयौ नेह नव रंग नयौ रस, नवल स्याम वृषभानु किसोरी।
नव पीतांबर नवल चूनरी, नई नई बूंदनि भींजति गोरी।।
नव वृन्दावन हरित मनोहर, नव चातक बोलत मोर मोरी।
नव मुरली जु मलार नई गतिः, श्रवन सुनत आये घन घोरी।।
नव भूषन नव मुकुट विराजत, नई नई उरप लेत थोरी थोरी।
(जै श्री) हित हरिवंश असीस देत मुख, चिरजीवी भूतल यह जोरी।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरासी (54)


आज नवल श्याम और नवल वृषभानु किशोरी में (परस्पर) नवीन स्नेह, नवीन आनन्द एवं नया ही रस भर रहा है। यहाँ श्याम सुन्दर का नया पीत पट है तो वहाँ वृषभानु किशोरी की नयी चूनरी । (उस नवल चूनरी को पहिने हुए) गोरी नयी ही नयी बूंदों से भींग रही हैं। जैसा नया, हरा-भरा और मनोहर वृन्दावन है, वैसे ही उसमें नये ही नये चातक, मोर और मयूरियां बोल रही हैं इधर नवल श्याम सुन्दर ने अपनी नयी मुरली में नयी ही गति से नवीन प्रकार का मलार राग छेड़ दिया है, जिसे सुनकर नये नये मेघ भी घिर कर घुमड़ आये हैं। श्रीश्याम सुन्दर के श्री अंगों में नये ही तो आभूषण हैं और सिर पर नया मुकुट विराज रहा है। वे नृत्य में उरप और तिरप नामक गतिया मन्द मंद ले रहे हैं। (इस नवीन सुख एवं समाज को देख कर) श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद (प्रीति पूर्वक) अपने मुख से आशीष देते हैं कि यह जोड़ी भूतल (इस लोक में मथुरा मण्डलान्तर्गत प्रकट श्रीवृन्दावन धाम) में क्रीड़ा करती हुई चिरजीवी रहे।)