नैननि देखीं और नहीं - श्री भगवत रसिक - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (2)

नैननि देखीं और नहीं - श्री भगवत रसिक - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (2)

नैननि देखीं और नहीं, श्रवण सुने नहीं और |
घ्राण न सूघोँ और कछु, रसना कहौं न और ||
रसना कहौं न और, त्वचा परसौं नहीं औरे |
कुंज बिहारी केलि झेलि, इन्द्रिन सब ठौरे ||
भगवत रसिक अनन्य, कोक उपदेसौं सैननि |
बैनन मैन जगाय, रैन दिन देखौं नैननि ||

- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (2)

भगवत रसिक जी कहते हैं कि मैं अब (श्रीयुगल की नित्य केलि के अतिरिक्त) न तो अपनी आँखों से कुछ और देखता हूँ, न कानों से कुछ और सुनता हूँ, न नासिका से कुछ और सूंघता हैं, न ही कानों से कुछ और सुनता हैं, न नासिका से कुछ और सूंघता हूँ, न जिह्वा (जीभ) से कुछ और कहता हूँ और न त्वचा से कुछ और छूता हैं। इस प्रकार में सदा सर्वत्र अपनी समस्त पांचों ज्ञानेन्द्रियों को श्रीश्यामा- कुंजबिहारी की नित्य कीड़ा में निमग्न करके उन्हें (प्रिया प्रियतम को) नयन संकेतों से अनवरत केलि का उपदेश करता रहता हूँ, वाणी से इस नित्य अनंग क्रीडा का रात दिन गान कर उसे उद्दीपन बनता हुआ मैं नेत्रों से इसी केलि को निहारता रहता हूँ।